गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

बस मैं......




मैं हूँ बस अपने तरह की ही....
न किसी से मिलती-जुलती,
न किसी की तरह,
होना ही चाहती हूँ मैं ! 
लोग न जाने क्यूँ....
मिलाना चाहते हैं मुझे
किसी न किसी से....
किसी के चेहरे से,
किसी के व्यवहार से,
किसी के व्यक्तित्व से,
किसी के विचार से,
या फिर अपने ही
सोच,विचार और व्यवहार से !
खुद तो चाहते नहीं
कि वो भी बदलें
अपने आप को कुछ-कुछ.....
लेकिन औरों को बदलने की
चाहतें सुगबुगाती रहती हैं
उनके दिल में हर वक्त !
क्या करें बेचारे....???
अपने ही दिल से मजबूर हैं...
और मैं भी क्या करूँ...?
खुद को इतना बदलने के बाद
लगने लगा कि....
मुझमें से मैं ही
निकल गयी हूँ कहीं दूर !
जिसके साथ, जिसके लिए
निकली थी मैं....
वो ही दूर हो गया मुझसे !
और जब उसी की
कुछ बातों ने झकझोर दिया
एक दिन अचानक मुझे
बाहर-भीतर तलक...
तो लगा कि
किसी के लिए
दूसरों की तरह होना
अपने-आप से नाइंसाफी है....
और फिर u turn.........!!
और आज मैं हूँ....
बिलकुल अपनी तरह,
न किसी की हमशक्ल,
न किसी की तरह !
बस........
खुदा की बनाई
फ़क़त एक  
"single piece........"

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

बस तुम.........


२६-१२-२०११



मैंने खुशबू की तरह
तेरे होने के एहसास को
अपने इर्द-गिर्द
कुछ ऐसे फैला लिया है
कि चाहूँ भी तो
कोई दूसरी महक
आ ही नहीं पाती
मेरे पास...........


*******************


तेरे होने का
एहसास ही बहुत है
मेरे लिए !
कम से कम
यह तो हुआ
कि मैं अकेली
नहीं रह गयी
खुद अपने ही लिए....

*************************

लोग तो
साथ रहते हुए भी
न जाने कितनी दूरियां
बना लेते हैं...
मन ही मन !
और एक हम हैं
कि तुझे मन से ही
अपना मान बैठे हैं
दूर से ही....







सोमवार, 26 दिसंबर 2011

मुट्ठी भर धुप......



 २४-१२-२०११

 

मुट्ठी भर धूप

चुरा के रखी थी

न जाने कब से

सबकी आँख बचा के...

आज मैंने बिखरा दी है

अपने आँगन में !

क्या करें...

इतनी सर्दी है,

सूरज भी तो

नहीं आता आज कल

गर्मी देने.....

न जाने  कहाँ

छुपा रहता है जालिम.....!!

रविवार, 25 दिसंबर 2011

तेरा होना......





अश्क बन जाऊं तो आँखों में छुपा सकता है !
दर्द बन जाऊं तो गीतों में  बदल  सकता   है !!

बनूँ   मुस्कान तो   होठों पे सजा   सकता   है !
बनूँ धड़कन तो अपने दिल में छुपा सकता है !!

गर बनूँ मोती गले मुझको लगा सकता है !
या बनूं फूल तो दामन से लगा सकता है !!

बन गयी खुशबू तो तू खुद भी महक सकता है !
जानती  हूँ   मुझे  तू दिल  से लगा सकता   है !!

मेरे  हमराज ! मेरे  दोस्त ! तेरे  इक होने  से !
मेरे  जीवन  का  हर अंदाज बदल सकता है !!

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

बस मैं हूँ और.....





अजनबी है कोई फिर भी वो अपना लगता है ! 
उससे न जाने कौन सा,कैसा रिश्ता लगता है !!

 दूर रह कर भी कोई आस-पास लगता है  !
मुझमें ही रहते हुए मुझसे जुदा लगता है !!

चलते-चलते मेरे कानों में कुछ कह जाता है !
सोते - सोते मुझे चुपके से जगा  जाता   है !!

हँसते - हँसते मेरी आँखों में वो बस जाता   है !
दिल में धड़कन की तरह छुप के उतर जाता है !!

मैं हूँ, बस मैं हूँ, कोई साथ नहीं है मेरे !
मेरी  तन्हाई  है, एहसास   हैं हमदम मेरे !!

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

कौन हो तुम...??




तुम कौन हो मेरे..?
न मैं जानूँ, न जानना चाहूँ..!
तुम क्या हो मेरे...?
न मैं मानूँ, न मानना चाहूँ..!!
पास हो इतने कि...
छू लूँ तुम्हें जब भी चाहूँ..!
आँख भी कर लूँ बंद
इन पलकों में तुम्हें ही पाऊँ..!!
कौन हो तुम...??
तुम ही कुछ बोलो...
कुछ तो बोलो.....!!

२१-१२-२०११
०१.०५ रात्रि. 

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

ये बातें....


१८ जन.१९८३


अभी तक
सुनती आयी थी कि
हवाएं गुनगुनाती हैं,
पर्वत बोलते है,
घाटियाँ खिलखिलाती हैं
पर मैं इन सब से अनजान थी
इनकी बोली,गुनगुनाहट,खिलखिलाहट
कुछ भी नहीं सुन पायी..
अपनी ही धुन में.
अपने आप में ही खोयी रही ! 
लेकिन अब...
तुमसे मिलने के बाद
अपने आप को जब भी 
अकेली पाती हूँ मैं, 
तब...
इन्हीं हवाओं,पर्वतों और घाटियों से  
घिरा पाती हूँ अपने आप को 
और न जाने कितनी देर तक
बातें करती रहती हूँ मैं
चुपचाप...........!!

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

एक किरण....







भोर की लाली के साथ
एक किरण चमकी
आशा की....
चहचहाती चिड़ियों ने
एक नया सुर दिया मेरे जीवन को !
सुगन्धित पवन ने
फूंक दिए प्राण
मेरे तन-मन में
और....
रात की सारी व्याकुलता
एकबारगी
दूर हो गयी
यह सुन कर कि
तुम आने वाले हो......!!

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

अशआर.....कुछ यूँ भी....!!

 
अशआर  मेरे यूँ तो ज़माने   के लिए   हैं !
कुछ शेर फ़कत तुझको सुनाने के लिए हैं !!

मेरी ज़रूरतों पे रहा मुझसे *बदगुमान !
एहसास तेरे यूँ   तो जमाने के लिए हैं !!
(*किसी के प्रति बुरी धारणा रखना) 

औरों के लिए लफ़्ज़ों में बरतता है एहतियात !
दे  दीं   दुहाइयां   ये   सजा   मेरे   लिए   है  !!

दुश्मन को भी न दे ऐसी सजा मेरे हमसफ़र !
रिश्ते बहुत से यूँ   तो   निभाने  के लिए  हैं !!

गर इश्क है दिलों में खा लें सूखी रोटियां !
पकवान यूँ तो ढेरों जमाने भर के लिए हैं !!

कायल हूँ तेरी*फ़ित्न:अन्दाजी पे मेरे दोस्त !
वर्ना बहुत  से दोस्त जमाने   में पड़े   हैं !!
(*इधर की उधर लगाने की आदत,भड़काना)

गर दो दिलों में इश्क हो तो बनता है रिश्ता !
वर्ना  बहुत से जिस्म   बाजारों   में  पड़े   हैं !!

दौलत के बल पे कौन खरीद पाया है ख़ुशी !
गर  मिल  गए  हों दिल  ख़जाने  खुले  पड़े हैं  !!

1 दिसंबर,2011 

सोमवार, 28 नवंबर 2011

अशआर कुछ ऐसे भी......





ऐतबार गर करते हो तो,शर्त लगाते क्यूँ हो..
प्यार करते हो तो,बेतरतीबी से जताते क्यूँ हो !
अपने ही प्यार के लिए माँगी थी कभी मोहलत हमसे
आज दिन है कि गैरों के आगे दामन फैलाते क्यूँ हो !!

************************************************

अगर वो गैर न थे तो इतने दिनों तक रहे कहाँ ?
जब भी आयीं मुश्किलात तो उनके भी आंसू थे कहाँ ?
जिन्दगी की मुश्किलों से जब हमने निकाल ली कश्ती...
आज किनारों पे बैठ हैं वो,फिर--हम कहाँ ? तुम कहाँ ?

************************************************


जिस्म मिल  जाने से ही दिल नहीं मिलते,ऐ दोस्त !
जिस्म को छोड़ कभी दिल भी मिलाया होता...!!
आज गर खोल दिया दिल को *वरक़ की मानिंद तूने
**वरके-खाम  पे अपने भी  कभी गौर किया  होता !!
तू क्या समझेगा मुझे,खुद को समझ पाया है क्या ?
मुझको एक ***मौजूं   बना  ग़ज़ल में  ढाला होता   !!
* पन्ना
**अंदरुनी हालात
***शेर



सोमवार, 21 नवंबर 2011

अंदाज़ अपना अपना....





वो सोचते रहे हम बात करेंगे उनसे कुछ अपनी.....
हम थे ऐसे के उन्हें मायूस ही कर बैठे...!
 
**  **  **  **  **  **  **  **  **  **  ** 
 
चाहना यूँ तुम्हारी फितरत ही सही...
एक हम हैं कि इनकार किये जाते हैं..!
 
**  **  **  **  **  **  **  **  **  **  ** 
 
कह दिया बेबाक हो कर तुमने कितना कुछ हमसे
और हम ये भी न कह पाए के हमें प्यार है तुमसे ही !!
 
**  **  **  **  **  **  **  **  **  **  **  **  **  **  **  
 
आरज़ू रह ही गयी हमारी कि देखें तुम्हें दिल के आईने में....
एक तुम थे के जब भी आये तो नकाब थी तुम्हारे चेहरे पे ! 
 
 
 
 

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

तौबा.....

 
बीता दी उम्र हमने जिनके लिए ,
वो न खुश हुए हमारी उल्फत से !
खुदा करे  मेहरबानियाँ  हम पे अपनी,
बाज़  आये हम जमाने भर की मोहब्बत से...!!
 

शनिवार, 12 नवंबर 2011

अल्फाज.........



कुछ अल्फाजों की कमी सी है !
उधार मिलें  कुछ बीज तो...
मैं भी बो दूं
मन के सन्नाटे में !
उग आयेंगे कुछ
अनचाहे से  अल्फाज़...
फिर गूंथ कर
उनको एक डोरी में,
बना लूंगी एक माला ! 
न सीधी सही...
टेढ़ी-मेढी ही सही...
कहीं काम तो आयेगी..
किसी तस्वीर पर चढ़ जायेगी,
किसी जूड़े में लग जायेगी
या फिर...
टांग दूंगी खूंटी पर
अपने ही कमरे में !!
यूँ पड़ी रहेगी तो...
कम से कम
कमरे को ही महकाएगी !!

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

इन्द्रधनुष......



मेरे अधरों पर
वो स्पर्श तुम्हारा
न भूल पायी मैं आज तक !
जब....
हौले से छू तुमने
पुकारा था मेरा नाम
मेरे ही कानों में....!
और एक इन्द्रधनुषी स्मित
खिल गयी थी गालों पर मेरे
यहाँ से वहां तक......
तब.....!!

शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

समर्पण.....



समर्पण....

मेरी ज़िंदगी में
एक ऐसा मोड़ आया
जब लगा कि
हाथ से सब छूट गया
जब अपने भी
साथ छोड़ गए थे,
उस वक़्त.....
बस तुम साथ थे !!
और मैंने सब कुछ
पा लिया था दुबारा,
वो मैं जो खो गई थी कहीं...
लगभग मृतप्राय सी...
तुम्हारे हाथ का स्पर्श पा कर
फिर से लौट आयी अपने-आप में,
और एक बार फिर से 
सांस लेने लगी मैं !
और आज हर वक़्त...
हाँ !अब हर वक़्त
तुम हो साथ मेरे !!
तुम्हारे साथ मैं कितना हूँ ?
मैं नहीं जानती..!
जानना चाहती भी नहीं !!
मेरी साँसें लौटा दीं हैं
तुमने एक बार फिर !
इस सब के लिए आज 
यदि मैं खुद को 
तुम्हें सौंप दूं तो.... 
क्या तुम्हें मंज़ूर होगा....?? 


रविवार, 23 अक्तूबर 2011

बड़े अच्छे....



करे बेनूर जिन्दगी, खुदा उन रंगों से !
हमारी जिन्दगी के दाग बहुत अच्छे हैं !!

हो गए हम भी होशियार उनकी सोहबत में !
वो समझते रहे हमको, अभी हम बच्चे हैं !!

न हुआ खुश वो हमारी लाख कोशिशों के बाद !
तब समझ आया ये,लाखों से हम भी अच्छे हैं !!

छोड़ हमको यहाँ तन्हा, बनाए रिश्ते  कई !
हम समझते रहे, खाविंद मेरे अच्छे  हैं !!

छुपा लीं तोहमतें उनकी, इस दिल में या रब !
वो समझने लगे ज़ालिम, के बड़े सच्चे हैं !!

बुधवार, 12 अक्तूबर 2011


कुछ ख्यालात.......


याद आती है कोई मखमली आवाज़ मुझे,
दिल से महसूस हुई आज कोई बात मुझे !

मैं कैसे खुद को भुला दूं तेरे इन अश्कों में,
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है मुझे !

तू मेरे सामने है फिर भी नज़र नहीं आता,
मूँद लूँ  आँखें मैं अपनी ये ख़याल आये मुझे !

मेरा तुझसे जो नाता केवल एक दर्द का है,
क्यूँ मेरे दिल में उतर कर सताए जाए मुझे !


(कभी नेकी भी उसके जी में गर आ जाये है मुझसे
जफ़ाएं करके अपनी याद शर्मा जाये  है मुझसे )

मंगलवार, 4 अक्तूबर 2011

कहीं वो तुम तो नहीं.............???


एक चेहरा है जो  हर  चेहरे में  मिल जाता है !
जब भी की  आँखें  बंद वो ही नज़र आता है !!

कभी शब्दों को  बदल गीत वो बन जाता है  !!
फिर वही गीत  मेरे  होठों पे बस  जाता   है !

बस के आँखों में मेरे दिल में उतर जाता है !
कभी बन फूल मेरी जुल्फों को महकता है !!

बन के मुस्कान मेरे चेहरे पे खिल जाता है !
सुनहरी  धूप सा रौशन मुझे कर जाता है !!

न कोई  नाम, न पहचान,  न रिश्ता है कोई !!
फिर भी कुछ है मेरा,जो सबमें नज़र आता है !

मेरा  सब कुछ   है वो, हर वक़्त साथ है मेरे !!
एक चेहरा जो बस अपना सा लगता है मुझे !

मैं   खोजती  हूँ   उसे   अपनों में  बेगानों  में !!
वो जो छुपता है औ'फिर मुझमें ही मिल जाता है !!

सोमवार, 26 सितंबर 2011

 
 













तू और मैं.......



ढाये चाहत ने सितम हम पे हैं  कुछ इस तरह,
रोते-रोते भी हंस दिए हैं हम  कुछ इस तरह !
चाहा  के  तुझको  छुपा  लूं   मैं  कहीं  इस तरह,
मैं ही मैं देखूं जमाने से छुपा कर  इस तरह !! 

तू था खुशबू की तरह,बिखरा जो फिर,छुप न सका,
बस मेरे दिल में रहे,ये भी तो तुझसे हो न सका !
रूह से अपनी जुदा   सोचा  कभी  कर दूं    तुझे ,
बन हया चमका जो नजरों में मेरी,छुप न सका !! 

चाह बन कर के मेरी ये चाह कभी रह न सकी,
गुफ्तगू तुझसे की जो चाहा छुपे, छुप न सकी !
तेरे सीने पे  सिर रख कर कभी मैं रो न सकी,
तेरे  आगोश में  आकर  कभी मैं  सो न सकी !!

आज है वो रात ,मैं  हूँ कहाँ और तू है कहाँ, 
बदले  हालात हैं और  बदल गए  दोनों  जहाँ !
साथ न रह के भी तू साथ मेरे, मेरे सनम!
दो बदन हम नहीं,एक रूह हैं,एक जान हैं हम !!  

मंगलवार, 20 सितंबर 2011


 
 
आकर्षण..........
 
 
जिन्दगी के इस
उतार-चढ़ाव में भी
रहते हैं दोनों साथ-साथ....
कभी-कभी मौन,
तो कभी कुछ बुदबुदाते,
कुछ चीखते-चिल्लाते...
बहे चले जा रहे हैं
एक-दूसरे का
हाथ पकड़े हुए
जोर से..
छोड़ने की चाह में
बंधन और कसता जाता है...!
कुछ है जो उन्हें एक-दूसरे से
जुदा नहीं होने दे रहा है...!
दोनों ही समर्पित खुद को,
साथ-साथ एक-दूसरे को भी, 
विपरीत का बंधन भी
आकर्षण से कम नहीं...!
 

गुरुवार, 15 सितंबर 2011




मुक्ति.....



कभी-कभी-
जीवन में.....
कितनी सहजता से
मुक्ति मिल जाती है
हर चीज़ से...
कि आप कल्पना नहीं कर सकते है,
जब तक-
आप किसी चीज़ को पकड़ कर
रखने कि कोशिश करते  हैं,
तो उसके छूटने पर
आपको दर्द और दुःख का
एहसास होता है.
जब हाथ ही खुला हो
तो छूटने का या--
छोड़ने का दर्द नहीं होता..
हथेली पर,
और उसके एहसास को
आप हमेशा महसूस कर सकते हैं !!
बंद मुट्ठी
खुलने पर तनाव का
एहसास दिलाती है !!
फिर  बात हथेली की हो
या दिल की...............!!!

गुरुवार, 8 सितंबर 2011




दोहरापन....


मन की बातों को
समझना और जानना 
दोनों ही बड़ा कठिन है..!!
ऊपर-ऊपर  के हमारे शब्द
जब हमारे भावों से
मेल न खाएं,
शब्द कुछ कहें
और चेहरे के भाव
कुछ और ही बताएं
तो........
कहीं कुछ चुभता है
एक छलावे का एहसास सा
करा जाता है मन को.....!
जो लोग जीते हैं
दोहरी जिन्दगी को...
दोहरे एहसास को...
हर पल, हर वक़्त
उनके लिए तो
आसान है ये सब ,
लेकिन जिनके लिए
मन के एहसास ही   
जिंदगी भी हों ,
उनके लिए मुश्किल है
ऐसी दोहरी नीति,दोगलापन !
और फिर.... 
सारी बातें,सारे स्पर्श
झूठे लगते है तब !!
जब हम कुछ कहें
और  हमारे चेहरे के भाव,
आँखें और खोया-खोया सा
ये मन कुछ  और कहे ...
तब.....!!
 


शनिवार, 6 अगस्त 2011


गुफ्तगू........


आज रात
बस....
अभी-अभी
चाँद आसमान से
उतर कर आ बैठा 
खिड़की में मेरे पास,
और देर रात 
हम देखते रहे
एक-दूसरे को,
न जाने कितनी
बातें की हमने ...
जानते हो !
तुम्हारा नाम भी 
आया था उसमें 
एक बार !!


एक खूबसूरत अनुभूति
रात्रि-२:१२
07-08-2011


गुरुवार, 28 जुलाई 2011





कौन हो तुम ?
मेरी आँखों में
जो आंसू बन के
झिलमिलाते हो !
मेरे होंठों पर
मुस्कान बन के
बिखर जाते हो !
मेरे दिल की
धड़कन के साथ
पल-पल धड़कते हो !
फूलों में मेरा हाथ
लगते ही खुशबू बन
बिखर-बिखर जाते हो !
ठंडी हवा के साथ
मेरे तन को एक
सिहरन दे जाते हो !
रुदन के साथ
मेरे दिल में
उतर जाते हो !
मेरी हंसी में तारों से 
चमक जाते हो !
मेरे मन में 
मनमोहन से 
हर पल 
मुस्कराते हो !
कौन हो तुम ??
कौन हो ???


रविवार, 10 जुलाई 2011

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
चाँद और तुम.....
 
 
तारों से भरे
नीले आसमान के नीचे
खुली छत पर
चांदनी की बिछी
सफ़ेद बेदाग़ चादर पर
बस यूँ ही
बैठे-बैठे.....
देर तक
तुम्हारे बालों को
अपने हाथों से सहलाते हुए
मेरा जी चाहता है...
तुमसे ढेर सी बातें करने का
कभी-कभी.....!!
 

मंगलवार, 21 जून 2011

खामोशियाँ........



जब मिले हम
कुछ न कुछ
कहते रहे
सुनते रहे,
हाथ में
बस हाथ थामे
हम यूँ ही बैठे रहे !
क्या कहा तुमने ?
सुना मैंने ?
ये जानूं न !
शब्द यूँ ही...
निरर्थक बहते रहे !
नयन से
नयनों की भाषा
कह रही थी कुछ !
अधर से
अधरों के कम्पन
सुन रहे थे कुछ !
धड़कने दिल की
न जाने थम गयीं क्यूँ ?
मूँद कर नयनों को
काँधे सिर धरा क्यूँ ?
समझ पायी
इस मिलन को
मैं आज तक न !
क्यूँ करूँ स्नेह इतना
मैं जान पायी न !
धड़कने
बस धड़कनों को
तोलती हैं,
कुछ कहो न आज बस
क्योंकि तुम्हारी
खामोशियाँ ही बोलती हैं....!!

सोमवार, 6 जून 2011


 

बसेरा......


प्रस्फुटित हों शब्द तुझसे,
तो वही है गीत मेरा....!!
गुनगुनाये तू जो सुर में,
है वही संगीत मेरा....!!
तू जहाँ ठहरा वहीँ पर,
बन गया गंतव्य मेरा....!!
तू जहाँ रहता है मन में,
है वहीँ मेरा बसेरा....!!


शनिवार, 4 जून 2011

 
 
तुम और  मैं...
 
तुम क्या हो मेरे ?
ये मैं ही जानती हूँ...!
मैं क्या हूँ ?
कुछ भी तो नहीं....
मैं खुद को भी तो
बस....
तुम्हारे नाम से ही जानती हूँ !!

बुधवार, 1 जून 2011





तेरे आने की खबर....



तेरे आने की खबर
कुछ इस तरह आयी...
जैसे उगती है सुबह की
मुलायम सुनहरी धूप,
जैसे खिलती है कोई
मासूम जूही की कली,
जैसे गुनगुनाते हैं
पंछी नया गीत कोई,
जैसे दूर तक फ़ैली
हरी-हरी दूब पर
शबनम की बूँदें,
जैसे दूर
मंदिर से आती
घंटी की आवाज़,
और घुल जाती है
खुशबू फिज़ा में...
कि....
तुम आने वाले हो !!

शुक्रवार, 27 मई 2011

हमारा मोबाईल.......


मैंने बहुतों को देखा है...
जो अपना मोबाईल...
अपने से ऐसे 
चिपका के रखते हैं...
जैसे दो शरीर एक जान हों...! 
उन्हें देख कर मुझे  
कुछ ऐसे ख़्याल आये....

मेरा मोबाईल...
रहता है हर समय
मेरे हाथ में.
क्यूंकि..
न जाने कब
निकल कर मेरे सामने
खड़े हो जाते हो तुम ! 
न जाने कब
मोबाईल से निकल कर
मेरा हाथ थाम कर
साथ-साथ चलने लगते हो तुम !
और न जाने कब
मोबाईल से निकल कर
एक प्यारा सा चुम्बन
गालों पे मेरे
चिपका जाते हो !
और न जाने कब
तुम आओगे
मोबाईल से निकल कर
मेरे पास और.....
मुझे बाहों में समेट कर
धीरे से कहोगे
मेरे कानों में
कि....
तुम्हें मुझसे प्यार है....!!



आज की बारिश..........

आज की  बारिश
कुछ इस तरह हुई
कि...
मेरे मन को
कुछ नए से
एहसास दे गई......
और टेरेस पर बैठे-बैठे
बारिश में भीगते-भीगते
मैं कुछ इस तरह लिख गई.....








आज मैंने देखा
बादल का
एक छोटा सा टुकड़ा
तेजी से उड़ते हुए
और सोचा ये....
कि
इस पर बैठकर
तुम भी तो  सकते थे..... !

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बारिश की बूँदें
तन की अगन को
शांत कर गईं 
और 
मन को-
तुम.......!! 

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मैंने तुम्हें
आज फिर
महसूस किया.....
घने काले बादलों में,
कड़कती बिजली की चमक में,
बारिश की फुहार में,
तन पर गिरती
ठंडी बूंदों में,
और
चेहरे पर
गिरती जुल्फों को
हटाते हुए
जैसे तुम
कह रहे हो
कानों में मेरे...
कि-
तुम पास हो मेरे !
मेरे बहुत-बहुत पास !!