शनिवार, 12 नवंबर 2011

अल्फाज.........



कुछ अल्फाजों की कमी सी है !
उधार मिलें  कुछ बीज तो...
मैं भी बो दूं
मन के सन्नाटे में !
उग आयेंगे कुछ
अनचाहे से  अल्फाज़...
फिर गूंथ कर
उनको एक डोरी में,
बना लूंगी एक माला ! 
न सीधी सही...
टेढ़ी-मेढी ही सही...
कहीं काम तो आयेगी..
किसी तस्वीर पर चढ़ जायेगी,
किसी जूड़े में लग जायेगी
या फिर...
टांग दूंगी खूंटी पर
अपने ही कमरे में !!
यूँ पड़ी रहेगी तो...
कम से कम
कमरे को ही महकाएगी !!

13 टिप्‍पणियां:

  1. दो शब्दों से गूँथ जाएगी माला
    सुन्दर !

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  2. sundar
    कुछ अल्फाजों की कमी सी है !
    उधार मिलें कुछ बीज तो...
    मैं भी बो दूं

    alfaazon kee kamee kyaa nahee kartee

    उनके
    अप्रतिम सौन्दर्य से
    अभिभूत था
    उनसे मिलने से पहले
    मन में
    सैकड़ों सपने संजोता
    क्या क्या कहना है
    मष्तिष्क में
    सूची बनाता
    मिलने पर जुबान को
    लकवा मार जाता
    मुंह से एक शब्द नहीं
    निकलता
    उनका निश्छल सरल
    व्यवहार
    निरंतर मेरे उनके
    बीच में आता
    मन का मनोरथ
    मन में रहता
    प्यार ह्रदय में दबा
    रहता
    मुझे एक शब्द भी
    कहने ना देता
    केवल मेरा मौन मेरा
    साथ देता
    12-11-2011
    1785-56-11-11

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  3. बहुत- बहुत आभार आपके स्नेह और समर्थन का.

    बहुत सुन्दर रचना , बधाई.

    .

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  4. सुन्दर भावनायों की माला.

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  5. शब्दों की माला बहुत सुंदर बिम्ब लिए है आपने, बधाई.........

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  6. in alfaazo me bahut takat hoti hai..........

    nya hu is blog ki duniya me
    fursat mile to kabhi is nachiz ki blog par bhi tashrif layega.......
    ye raha pata...
    www.kashikenjare.blogspot.com

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  7. यूँ पड़ी रहेगी तो...
    कम से कम
    कमरे को ही महकाएगी !!

    सही है पूनम जी अल्फाज़ कही न कही असर तो ज़रूर करेंगे|

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  8. आपके पास अल्फाज़ तो हैं तभी तो इतनी अच्छी कविता लिखी आपने.

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  9. बहुत बढ़िया....कुछ ऐसा जो आमतौर पर पढ़ने नहीं मिला करता..। मेरे पोस्ट पर आकर मेरा मनोबल बढ़ाएं ।.बधाई ।

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  10. मन के सन्नाटे में !
    उग आयेंगे कुछ
    अनचाहे से अल्फाज़...
    ......
    यूँ पड़ी रहेगी तो...
    कम से कम
    कमरे को ही महकाएगी !!

    हर जगह अनचाहे अलफ़ाज़ ही हैं ...गूंजते हैं कानो में अहिर्निशी .... वैसे पूनम जी माला सूख ना जये जाये इसका भी कुछ प्रबंध करना ही पड़ेगा ...
    सुंदर रचना मन के या यों कहें कि प्रेम के मनोविज्ञान पर गहरी पकड़ है आपकी !

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