शनिवार, 17 दिसंबर 2011

ये बातें....


१८ जन.१९८३


अभी तक
सुनती आयी थी कि
हवाएं गुनगुनाती हैं,
पर्वत बोलते है,
घाटियाँ खिलखिलाती हैं
पर मैं इन सब से अनजान थी
इनकी बोली,गुनगुनाहट,खिलखिलाहट
कुछ भी नहीं सुन पायी..
अपनी ही धुन में.
अपने आप में ही खोयी रही ! 
लेकिन अब...
तुमसे मिलने के बाद
अपने आप को जब भी 
अकेली पाती हूँ मैं, 
तब...
इन्हीं हवाओं,पर्वतों और घाटियों से  
घिरा पाती हूँ अपने आप को 
और न जाने कितनी देर तक
बातें करती रहती हूँ मैं
चुपचाप...........!!

15 टिप्‍पणियां:

  1. अभी तक
    सुनती आयी थी कि
    हवाएं गुनगुनाती हैं,
    पर्वत बोलते है,
    घाटियाँ खिलखिलाती हैं
    पर मैं इन सब से अनजान थी
    इनकी बोली,गुनगुनाहट,खिलखिलाहट
    कुछ भी नहीं सुन पायी..
    अपनी ही धुन में.
    अपने आप में ही खोयी रही !
    लेकिन अब...
    तुमसे मिलने के बाद
    अपने आप को जब भी
    अकेली पाती हूँ मैं,
    बिलकुल जजा बिम्बों ,प्रतीकों और भावों से सजी मन को छू लेने वाली कविता पूनम जी बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं |

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  2. anjaani bhoolon par bhee wah aday dand to deti hai..par boodhon ko bhee bacchon sa saday bhav se seti hai...prakriti kee gode me hamesh hee shanti milti hai...chir shanti bhee..tanhai me isse bada koi sathi nahi ..behtarin panktiyan...sadar badhayee aaur apne blog par amantran ke satha

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  3. आपका पोस्ट अच्छा लगा । मेरे नए पोस्ट "खुशवंत सिंह" पर आपकी प्रतिक्रियायों की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद ।

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  4. इन्हीं हवाओं,पर्वतों और घाटियों से
    घिरा पाती हूँ अपने आप को
    और न जाने कितनी देर तक
    बातें करती रहती हूँ मैं
    चुपचाप...........!!

    bahut sunder...

    उत्तर देंहटाएं
  5. ये तो हमसे भी पुरानी रचना है :-) (तारीख के मुताबिक)

    मुहब्बत में गिरफ्तार होने पर हर चीज़ बोलने लगती है |

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  6. बेहतरीन रचना अच्छी प्रस्तुती,....उम्दा पोस्ट

    मेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....

    आफिस में क्लर्क का, व्यापार में संपर्क का.
    जीवन में वर्क का, रेखाओं में कर्क का,
    कवि में बिहारी का, कथा में तिवारी का,
    सभा में दरवारी का,भोजन में तरकारी का.
    महत्व है,...

    पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे

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  7. वाह...!
    बहुत ही सुंदर कविता।

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  8. आपकी प्रस्तुति मन भावन व मन मोहक है ,पूनम जी.
    मनोभावों को बहुत सुन्दर पिरो देतीं हैं आप.
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

    मेरी पोस्ट 'हनुमान लीला भाग-२' पर आपका स्वागत है.

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  9. लेकिन अब...
    तुमसे मिलने के बाद
    अपने आप को जब भी
    अकेली पाती हूँ मैं,
    तब...
    इन्हीं हवाओं,पर्वतों और घाटियों से
    घिरा पाती हूँ अपने आप को
    और न जाने कितनी देर तक
    बातें करती रहती हूँ मैं
    चुपचाप...........!!...
    ...
    उस मोहक क्रांति कि यादें फिर से आ रही हैं पूनम जी ...शुभ है !

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