मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

प्रेम वही है.....



सही मायने में प्रेम वही है.....
जो कहा न जाए...
और सुनने वाला सुन ले,
कभी आँखें से,
तो कभी एक हल्का सा 
स्पर्श ही वो सब कह जाए...
जिसे बिन बोले ही
सुना जाए.....समझा जाए....!
जहाँ न कोई अपेक्षा हो 
और न ही कोई उपेक्षा...
न हो कोई अवहेलना,
और न ही कोई उपालंभ !
प्रेम बस चाहता है सम्मान
एक दूसरे की नज़रों में,
और एक ईमानदार साझेदारी....!
लेकिन हम खुद ही 
न जाने कैसे और कब 
अपनी ही कही 
सारी बातें भूल जाते हैं....
'प्रेम' करने की बातें तो 
बड़े जोर-शोर से करते हैं,
लेकिन उससे जुड़ा सम्मान 
और उसकी मर्यादा भूल जाते हैं,
और मौका मिलते ही 
गैरों के सामने भी  
अपने ही प्रेम की 
सियन उधेड़ने से भी 
बाज़ नहीं आते हैं.....!

14 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेम बस चाहता है सम्मान
    एक दूसरे की नज़रों में,
    और एक ईमानदार साझेदारी....!

    निश्चित ही ऐसा प्रेम कालजयी होता है ....आपकी रचना एक सुंदर दिशानिर्देश देती है प्रेम करने का ....प्रेम में आगे बढ़ने का ....!

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  2. प्रेम बस चाहता है सम्मान
    एक दूसरे की नज़रों में,
    और एक ईमानदार साझेदारी....!

    सटीक लिखा है ...

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  3. बिलकुल सहमत हूँ आपसे दी.....इसमें ईमानदारी बहुत ही ज्यादा ज़रूरी है |

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  4. प्रेम' करने की बातें तो
    बड़े जोर-शोर से करते हैं,
    लेकिन उससे जुड़ा सम्मान
    और उसकी मर्यादा भूल जाते हैं,
    और मौका मिलते ही
    गैरों के सामने भी
    अपने ही प्रेम की
    सियन उधेड़ने से भी
    बाज़ नहीं आते हैं.....!
    प्रेम = परे +मय अर्थात अहंकार से दूर होकर ही सच्चे प्यार को समझा जा सकता है .....जब भी सच्चा प्यार होगा तो मर्यादा कभी नहीं भूल सकता मनुष्य | प्रेमी अगर अपने प्रेम का इजहार भी सार्वजानिक रूप से करेगा तो प्रेमिका सहज और सहर्ष स्वीकार करेगी और यदि प्रेमिका प्रेम को सार्वजानिक करेगी तो प्रेमी भी सहज होकर स्वीकार कर लेगा | क्यों की सच्चे प्रेम में सम्मान और अपमान का अहंकार विलुप्त हो जाता है , और यदि सच्चा प्रेम नहीं होता अर्थात जो प्रेम स्वार्थों की पूर्ती के लिए होते हैं वहाँ अक्सर पर्दादारी तो होगा ही पूनम जी | सुन्दर रचना के लिए सदर आभार.|

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    1. सही कहा नवीन जी......
      सहमत हूँ आपसे !

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  5. पूनम जी ,
    आपसे बिलकुल सहमत हूँ मैं.

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  6. sach kaha mam aapne par aaj ki yuwa pidhi ko in shabdo ke mayne bhi nahi pata hote hai..........

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  7. prem dil se hotaa hai, dikhawe se nahi. Kabhi kabhi aapne dekha hogaa do dilo se ek sath ek sabd nikalataa hai, kyo ? kyonki wo do dil nahi hote, ek hote hai, yahi hai sachha prem.

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  8. सच ! प्रेम तो महसूस करने की चीज होती है...!
    बहुत सुन्दर रचना !
    आभार !

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  9. प्रेम बस चाहता है सम्मान
    एक दूसरे की नज़रों में,
    और एक ईमानदार साझेदारी....!

    .....सच में प्रेम और कुछ नहीं चाहता इसके सिवाय ...बहुत भावपूर्ण रचना..

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  10. प्रेम अकथनीय है...सुंदर रचना!

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