मंगलवार, 10 मई 2011

 








कृष्ण.....!!!(शरीर नहीं चेतना ) 



कृष्ण...!!!

हाँ,

तुमने खुद को  

हमेशा कृष्ण की जगह रखा

अपने इर्द-गिर्द  

गोपियों की कल्पना भी की

परन्तु मुझे......

रुक्मिणी की जगह  

न रख सके तुम !

वह अधिकार

जो कृष्ण ने रुक्मिणी को दिए

विवाह के बाद,

उसकी मर्यादा भी  

न रख सके तुम !

उस समय  

एक आम इंसान की तरह

तुम्हारे सारे भाव जागृत हो गए,

एक आम इंसान  की तरह  

"I AM ALWAYS RIGHT"

और तुम्हारा अहंकार  

हमारे बीच आ गए  !

फिर किस बात का  

झूठा दंभ भरते हो

बस ! यूँ ही खुद में कृष्ण को  

देखने की चेष्टा करते हो  !

कृष्ण तो एक चेतना  है....

एक शुद्ध समग्र चेतना  !!!

न स्त्री....!

न पुरुष.....!

शरीर से जुदा.... !

देह से अलग.... !

लेकिन तुम उनके शारीरिक क्रिया-कलापों का ही

उदाहरण देते रह गए ,

चेतना तक क्या कभी पहुँच पाए ?

मेरी भावनाओं को नकार कर

तुम बस  मेरे शरीर को ही टटोलते रह गए !

तुम्हारे इस उपापोह में

मैं कब अपने शरीर, अपने मन  से

अलग  हो  गई !

पता ही नहीं चला  !!

उस समय तो न पूछ पाई तुमसे

लेकिन आज पूछती हूँ....

कुछ खोज रहे थे तुम  ?

जो खोजा क्या वह पाया तुमने  ?

पता नहीं ?

बस इतना जानती हूँ  

कि तुम....

बस मेरे शरीर तक ही पहुंचे..

मेरी आत्मा तक तुम पहुँच ही नहीं  पाए....!!

22 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर कथ्य-
    --सच कहा...क्रष्ण एक चेतना है..जीवन का लक्ष्य.....पूर्ण ब्रह्म...शरीर, मन, आत्म से परे...उस तक पहंचने का क्रम करना है तो ..आत्मा तक पहुंचना ही पडेगा...हां मन तक पहुंचने का शरीर एक माध्यम है.... बस...वहां रुक जाना अपूर्णता है....

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  2. आप तो बहुत अच्छालिखती हैं...बधाई.
    _____________________________
    पाखी की दुनिया : आकाशवाणी पर भी गूंजेगी पाखी की मासूम बातें

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  3. बहुत गहरी ... कृष्ण के माध्यम से नारी मान की भावनाओं को लिख दिया है आपने ...

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  4. कौन क्या समझता है क्या चाहता है यह उसकी प्रवृति , यदि अपनी दृष्टि सूक्ष्म है तो प्रश्न का कैसा औचित्य

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  5. मन से मन के मिलन की चाह
    और कुछ बेमन-सा बंधन ...
    कृति
    इंसान के मन की
    हर बात कह पा रही है

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  6. ये एक गहरा दर्शन समेटे हुए है पोस्ट..........लाजवाब है काश कुछ लोग जो मज़हब के नाम पर नफरत की दीवारें खड़ी किये हुए हैं इसको समझ पाते......बहुत ही खूबसूरत पोस्ट.......हैट्स ऑफ

    कृष्ण तो एक चेतना है....

    एक शुद्ध समग्र चेतना !!!

    न स्त्री....!

    न पुरुष.....!

    शरीर से जुदा.... !

    देह से अलग.... !

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  7. Bahut badhiya Punam ji...Jo sharir ki yatra par nikalte hain ,wo martya lok mein hi rah jaate...jo man ki yatra par nikal aatmaa tak jaane ki chah rakhte,wo sashrir swarhik aanand ki anubhuti mein doobe rahte hain...par shayad aaj ki duniya mein log sharir se bahar nikal hi nahi paate...Rukmini ka bhale sab kuch mila...sharir ki yatra ki sanliptata bhi, par Radha ka sthan nahi...Krishna ke sath sirf Radha hi mandir mein pratishtit hoti hain...kyunki Aatma ka milan sarvopari...Iishwareeya...

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  8. गहरा दर्शन समेटे हुए सुन्दर रचना ..
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  9. पूनम जी.शायद मैं पहलीबार आपके ब्लॉग पर आया हूँ.कृष्ण और रुक्मिणी का प्रतीक लेकर मानवीय अहंकार और और उसके मन के विचलन का बहुत ही सटीक चित्रण किया है आपने.पढ़कर बहुत अच्छा लगा.

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  10. सीधा सपाट सवाल....जो तल्ख़ तो है पर सच है ...

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  11. कृष्ण कौन हैं
    जब भी उन्होंने ढूँढा है
    इंसानों के रूप सा
    गोपियों के मोह से
    कृष्ण को लिपटे पाया है

    कृष्ण तो कृष्ण है जो
    इन्सान का एक साया है
    जो तपती धुप में भी
    इंसान से जुड़ा पाया है
    लिपट हुई गोपियाँ भी तो
    उस साये का प्रेम प्रतिबिम्ब है

    त्रास है उन इंसानों का
    कृष्ण जिनको नहीं समझ आया है


    बहुत खूब लिखती है.. यूँ ही लिखती रहे ..अपने अंदर के भावों को यूँ ही सजाती रहे...गहनों से शब्दों के अपने आपको सजाती रहे.....

    संजय
    http://chaupal-ashu.blogspot.com/

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  12. सुन्दर भावमय चित्रण मन को उद्दवेलित कर रहा है.
    संगीता जी ने तो अपनी मधुर मधुर हलचल
    में इसे शामिल कर,हलचल का खुमार कई गुना
    बढ़ा दिया है.

    बहुत बहुत आभार,पूनम जी.

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  13. बस इतना जानती हूँ

    कि तुम....

    बस मेरे शरीर तक ही पहुंचे..

    मेरी आत्मा तक तुम पहुँच ही नहीं पाए....!!


    स्त्री मन कि व्यथा को सरल शब्दों से सजा दिया आपने ...बहुत ही खूबसूरती से मन के भावो को लिख दिया ...........बहुत खूब

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  14. स्त्री के दर्द का बहुत सुन्दर चित्रण...

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  15. स्त्री की स्त्रियोचित भावनाओं का सटीक चित्रण.

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  16. बस इतना जानती हूँ
    कि तुम....
    बस मेरे शरीर तक ही पहुंचे..
    मेरी आत्मा तक तुम पहुँच ही नहीं पाए....!!

    सुंदर और प्रभावशाली चित्रण.

    बधाई.

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