गुरुवार, 28 अप्रैल 2011



अपनी ही श्रद्धांजलि........


हमने हमेशा तभी कुछ कहा..
जब कोई सुनने वाला हो सामने...!
हमने तभी कुछ किया
जब देखने वाला हो कोई सामने...!!
क्या कभी खुद से भी कुछ कहा ऐसा..
जो अभी तक नहीं कहा हो किसी से..?
क्या कभी कुछ ऐसा भी किया
जो किया हो केवल अपनी ख़ुशी से..?
हम करते हैं
कुछ भी तो
दिखाते हैं...
बताते हैं...
जिनके लिए करते है,
उनको बताते हैं
साथ में सारी दुनिया को बताते हैं !
राजा हरिश्चंद्र होने का
तमगा खुद अपने हाथों से लगते हैं !!
कभी-कभी
जीसस की तरह सूली भी
खुद को ही लगाते हैं...
एक तरह से खुद को
श्रद्धांजलि ही दे डालते हैं !
और फिर लोगों को
ये भी जताते हैं कि...
हम शहीद हो गए उनके लिए..!!




21 टिप्‍पणियां:

  1. क्या कभी खुद से भी कुछ कहा ऐसा..
    जो अभी तक नहीं कहा हो किसी से..?
    क्या कभी कुछ ऐसा भी किया
    जो किया हो केवल अपनी ख़ुशी से..?


    आदरणीय पूनम जी
    अंतर्मन को सोचने पर मजबूर करती हुई पंक्तियाँ हमारे जीवन की सचाई को उद्घाटित करती हैं ..जीवन में जो भी कर्म करते हैं उसे दूसरों से प्रभवित होकर करते हैं अगर खुद की सूझ बुझ से कर्म किया जाये तो जीवन के मायने ही बदल जायेंगे ......बहुत सुंदर रचना ..!

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  2. सुभानाल्लाह.......सलाम है आपको इस पोस्ट के लिए ........बहुत गहरी बात कही है आपने......ये एक मनोवैज्ञानिक सत्य है ...........बहुत सुन्दर |

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  3. क्या कभी कुछ ऐसा भी किया
    जो किया हो केवल अपनी ख़ुशी से..?
    हम करते हैं
    कुछ भी तो
    दिखाते हैं...

    गहन अभिव्यक्ति

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  4. पहली बार आपके ब्लॉग पर आया और आपकी कवितों से प्रभावित हुआ हूँ.. वर्तमान कविता में भाव नदी की धारा की तरह अविरल बह रहे हैं... बहुत सुन्दर कविता...

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  5. बहुत जानदार प्रहार किया आपने.

    दुनाली पर देखें
    चलने की ख्वाहिश...

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  6. बहुत सुन्दर कविता|गहन अभिव्यक्ति|

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  7. सुंदर भाव समेटे एक बढ़िया रचना पढ़ने को मिली..बधाई पूनम जी

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  8. पूनम जी प्रणाम !
    बड़ा अजीब सा प्रश्न पूछ लिया आपने तो....बहुत देर सोचता रहा की मैंने सिर्फ और सिर्फ खुद के लिए पिछली बार क्या किया था....कहने को तो हर इंसान सभी काम खुद के लिए ही करता है...पर .....दिखावे से दूर, पछतावे से दूर, खुद को बाकियों में श्रेस्ठ बनाने के उपक्रम से दूर........क्या किया था पिछली बार......

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  9. पूनम जी ,नमस्कार.इस तथाकथित आप-धापी में स्वयं को सुनने,समझने समय कहाँ है किसी के पास,ऐसा लोग कहते हैं क्योंकि वे ऐसा सोचते हैं.शायद सारी समस्याओं और परेशानियों की जड़ यही है. "हम करते हैं कुछ भी तो दिखाते हैं...बताते हैं..."मन की बात कह दी आपने. सिर्फ भोक्ता बनकर जीने से अच्छा है,साक्षी को सदा साथ रखकर जीना.बहुत सुंदर एवं मार्गदर्शी रचना के लिए बधाई.

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  10. बात तो सच है , कई बार हम अपनी आलोचना करने के बाद भी ये सोचते है की लोग हमको इज्जत से देख्नेगे क्यू की हमने अपने गिरेबान में झाँका है .

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  11. आप सभी का धन्यवाद...

    अक्सर इंसान दो क्या तीन चार चेहरे और व्यक्तित्व रखता है..

    घर,बाहर और समाज में यहाँ तक कि विभिन्न प्रकार के लोगों के साथ अपने अलग-अलग चेहरों में मिलता है.. बहुत कम लोग ही हैं जो भीतर-बाहर एक से होते हैं.. ये एक सवाल हर इंसान को खुद से करना चाहिए यदि वह ज्ञानवान,संवेदनशील,बौद्धिक और आध्यात्मिक सोच रखता है तो.... वरना विभिन्न मुखौटों में घूमते आपको कितने ही लोग अपने इर्द-गिर्द मिल जायेंगे....विषय सोचने का है यदि इंसान सोचे तो.....वरना जिन्दगी यूँ भी गुजारी जा सकती है वो भी बड़े आराम से...!!

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  12. हम करते हैं
    कुछ भी तो
    दिखाते हैं...
    बताते हैं...
    जिनके लिए करते है,
    उनको बताते हैं
    साथ में सारी दुनिया को बताते हैं !
    राजा हरिश्चंद्र होने का
    तमगा खुद अपने हाथों से लगते हैं !!
    कभी-कभी
    जीसस की तरह सूली भी
    खुद को ही लगाते हैं...
    एक तरह से खुद को
    श्रद्धांजलि ही दे डालते हैं !
    और फिर लोगों को
    ये भी जताते हैं कि...
    हम शहीद हो गए उनके लिए..!!

    बहुत सुन्दर, कभी मेरे दर पर भी तशरीफ़ लायें !

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  13. चे"हरों के बदलते ये मौसम में,
    जरूरी है सामने एक आईना रखना"।

    बहुत ही सुंदर रचना। मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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  14. poonamji nadiyaa ban bahen hain aapke kataaksh !
    sakshi bhaav se jeene kee seekh bhi de jaati hai aapki kavitaa !saudeshya rachnaa ke liye badhaai .
    veerubhai .

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  15. punam ji,
    bahut sach kaha, hum aatmprashansa chahte hain, kya bina logon ko jataaye harishchandra nahin bana ja sakta ya koi jisus christ ya fir koi mahan kaarya nahin kiya ja sakta? ye prashn har kisi ko sochna chahiye. lekin aadmi kee kaamna hoti ki uska shohrat faile, aur is chaah mein kabhi kabhi khud ko mahan banane keliye khud ko shradhanjali de dalte. bahut achhi rachna, badhai sweekaaren.

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  16. क्या कभी खुद से भी कुछ कहा ऐसा..
    जो अभी तक नहीं कहा हो किसी से..?
    क्या कभी कुछ ऐसा भी किया
    जो किया हो केवल अपनी ख़ुशी से..?
    -इन पंक्तियों में आपने सही कहा है । हमें कभी-कभी अपने से भी जुड़ना चाहिए । ले देकर एक जन्म मिला है । कभी यह भी सोचें कि हम क्या हैं । हमें क्या चाहिए? ऐसा सोचने पर शायद हम मशीन बनने से बच जाएँ ।

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  17. एक अच्छी कविता के लिए आपको बधाई और शुभकामनाएं |

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  18. वाह!

    एक अन्दर तक झकझोरता सा वयंग्य....



    कुंवर जी,

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  19. पुनम जी
    नमस्कार !
    बहुत विलंब से आ पाया हूं आपके यहां , क्षमा कीजिएगा …

    कई पोस्ट्स पढ़ी हैं आपकी , कुछ फिर पढ़ने आऊंगा …
    बहुत गंभीर हिला देने वाली इस रचना के लिए बधाई !
    अंदर का दर्द आत्मा की सच्चाई के साथ उभरा है आपकी रचना में …

    मैं ऐसी ईमानदार रचनाओं को बहुत पसंद करता हूं …
    आभार !
    शुभकामनाओं सहित
    राजेन्द्र स्वर्णकार

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