गुरुवार, 19 मई 2011


भीगा मौन.....

बोलने वाले भी  
जाने क्या-क्या बोल जाते हैं
कहना होता है कुछ  
और कुछ और ही कह जाते है  
जहाँ ज़रुरत होती है खामोशी की
वहां शब्दों को यूँ ही 
व्यर्थ गँवाते हैं
और इस तरह वो...
भावनाओं का गीलापन तक  
महसूस नहीं कर पाते हैं
और फिर जिन्दगी भर 
अपने में नहीं...
बाहर ही कुछ खोजते रह जाते हैं,

मौन
में लिखे अक्षर भीगे ही होते हैं..!
ज़रुरत
है उनका गीलापन महसूस करने की !
जिसे
शायद बिरले ही समझ पाते हैं..!!
वर्ना
बोल-बोल कर 
शब्द
अपना महत्त्व खोते जाते हैं..!!

3 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल सही कहा है आपने.....सहमत हूँ आपसे.......लाजवाब |

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  2. जाने क्या-क्या बोल जाते हैं
    कहना होता है कुछ
    और कुछ और ही कह जाते है
    जहाँ ज़रुरत होती है खामोशी की

    वहां शब्दों को यूँ ही
    व्यर्थ गँवाते हैं
    bahut khub likha hai aapne.....

    उत्तर देंहटाएं
  3. पुनम जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    मौन में लिखे अक्षर भीगे ही होते है … !
    ज़रुरत है उनका गीलापन महसूस करने की !

    लगता है , बहुत जज़्बाती हैं आप भी !

    घायल की गत घायल जाने … और न जाने कोय …

    हृदय से आपको
    बधाई और शुभकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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