गुरुवार, 9 जनवरी 2014

हम यहीं थे कभी...हम यहीं हैं अभी...!




वो उठाते नहीं...नाज़ नखरे कभी...
हम कहाँ जायेंगे...आ गए...बस अभी...!
जब कभी फिक्र हो तो बुला लीजिए..
हम यहीं थे कभी...हम यहीं हैं अभी...!

नींद मेरी उड़ा के वो पूछा किये...
आप सो जाइए...हम जगेंगे अभी...! 

नाम रोशन हुआ इस कदर है यहाँ..
छोड़ महफ़िल को ना जायेंगे हम कभी..

दोस्त कहते हो हमको...खफा तुम ही हो...
है बुरी बात...बदलो अभी के अभी...!!

अब इजाज़त हमें दीजिए बज़्म से...
हम मिलेंगे यहीं...शुक्रिया है अभी...!  





9 टिप्‍पणियां:

  1. दोस्त कहते हो हमको...खफा तुम ही हो...
    है बुरी बात...बदलो अभी के अभी...!!

    क्या बात है पूनम जी, आपसे कौन दोस्त खफा होने का दुस्साहस कर सकता है.
    नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (11-1-2014) "ठीक नहीं" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1489" पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

    उत्तर देंहटाएं