गुरुवार, 20 मार्च 2014

या खुदा! वक्त कुछ ठहर जाये.....




वो मेरे दिल से क्यूँ उतर जाये...
खुद कहे और खुद मुकर जाये...!

वो ख़फ़ा है अगरचे मुझसे तो...
कैसे तकदीर ये संवर जाए...!

उसकी महफिल में बात जो बिगड़ी...
क्या करूं अब कि वो सुधर जाये...!

राह चलते हुए मिला मुझको...
वो समझ पाए न किधर जाये...!

कोई आया नहीं यहाँ अब तक...
एक साया सा ही लहर जाए...!

उसने जाने की अब तो ठानी है...
या खुदा वक्त कुछ ठहर जाये...!

उलझने हद से बढ़ गयीं मेरी...
क्या करूं अब न वो  नज़र आये...!

उसका दिल क्यूँ कोई दुखाता है...
गम नहीं मुझपे जो गुज़र जाये...!

काश ! शब  लौट आये पूनम की...
चांदनी दर पे फिर बिखर जाए...!







4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (21-03-2014) को "उपवन लगे रिझाने" (चर्चा मंच-1558) में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुंदर शब्दों से सजी बेहतरीन प्रस्तुति..होली की शुभकामनाएं

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  3. उसने जाने की अब तो ठानी है...
    या खुदा वक्त कुछ ठहर जाये...!
    बहुत ही लाजवाब ... हर शेर प्रेममय कर रहा है माहोल को ..

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