गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

.ज़रूरी तो नहीं.....





मिट रहा था जो मेरे खातिर...फरेबी था बड़ा 
इश्क हो मुझसे उसे भी....ये ज़रूरी तो नहीं...!

जो सजा लेते हैं अपनी मुस्कुराहट झूठ ही
सच ही होगा दिल में उनके...ये ज़रूरी तो नहीं...!

आज का ये वक्त..ये महफ़िल...समां...रंगीनियाँ
हों मगर तेरे ही दम से....ये ज़रूरी तो नहीं...!

मौत मेरे नाम से बस...आज यूँ शरमा गयी...
आ के ले जाये मुझे ही...ये ज़रूरी तो नहीं...!

थी खिज़ां की गर्मियां नज़दीक दामन से मेरे...
पर जला दें आशियाँ मेरा...ज़रूरी तो नहीं...!

अब नहीं हैं खैरियत मेरी ज़माने में यहाँ
आप भी माने मेरी बातें...ज़रूरी तो नहीं...!




10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना मुझे बहुत अच्छी लगी .........
    शनिवार 19/10/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    में आपकी प्रतीक्षा करूँगी.... आइएगा न....
    धन्यवाद!

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  2. यूँ तो कुछ ज़रूरी नहीं ,मगर यूँ होता तो क्या बात होती !!!
    :-)

    अनु

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (18-10-2013) "मैं तो यूँ ही बुनता हूँ (चर्चा मंचःअंक-1402) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. बहुत ही खुबसूरत और प्यारी रचना..... भावो का सुन्दर समायोजन......

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  5. मौत मेरे नाम से बस...आज यूँ शरमा गयी...
    आ के ले जाये मुझे ही...ये ज़रूरी तो नहीं...!

    वाह ! बेहतरीन सुंदर गजल !

    RECENT POST : - एक जबाब माँगा था.

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