सोमवार, 26 दिसंबर 2011
रविवार, 25 दिसंबर 2011
तेरा होना......

अश्क बन जाऊं तो आँखों में छुपा सकता है !
दर्द बन जाऊं तो गीतों में बदल सकता है !!
बनूँ मुस्कान तो होठों पे सजा सकता है !
बनूँ धड़कन तो अपने दिल में छुपा सकता है !!
गर बनूँ मोती गले मुझको लगा सकता है !
या बनूं फूल तो दामन से लगा सकता है !!
बन गयी खुशबू तो तू खुद भी महक सकता है !
जानती हूँ मुझे तू दिल से लगा सकता है !!
मेरे हमराज ! मेरे दोस्त ! तेरे इक होने से !
मेरे जीवन का हर अंदाज बदल सकता है !!
गुरुवार, 22 दिसंबर 2011
बस मैं हूँ और.....

अजनबी है कोई फिर भी वो अपना लगता है !
उससे न जाने कौन सा,कैसा रिश्ता लगता है !!
दूर रह कर भी कोई आस-पास लगता है !
मुझमें ही रहते हुए मुझसे जुदा लगता है !!
चलते-चलते मेरे कानों में कुछ कह जाता है !
सोते - सोते मुझे चुपके से जगा जाता है !!
हँसते - हँसते मेरी आँखों में वो बस जाता है !
दिल में धड़कन की तरह छुप के उतर जाता है !!
मैं हूँ, बस मैं हूँ, कोई साथ नहीं है मेरे !
मेरी तन्हाई है, एहसास हैं हमदम मेरे !!
मंगलवार, 20 दिसंबर 2011
शनिवार, 17 दिसंबर 2011
ये बातें....
१८ जन.१९८३
अभी तक
सुनती आयी थी कि
हवाएं गुनगुनाती हैं,
पर्वत बोलते है,
घाटियाँ खिलखिलाती हैं
पर मैं इन सब से अनजान थी
इनकी बोली,गुनगुनाहट,खिलखिलाहट
कुछ भी नहीं सुन पायी..
अपनी ही धुन में.
अपने आप में ही खोयी रही !
लेकिन अब...
तुमसे मिलने के बाद
अपने आप को जब भी
अकेली पाती हूँ मैं,
तब...
इन्हीं हवाओं,पर्वतों और घाटियों से
घिरा पाती हूँ अपने आप को
और न जाने कितनी देर तक
बातें करती रहती हूँ मैं
चुपचाप...........!!
गुरुवार, 15 दिसंबर 2011
गुरुवार, 8 दिसंबर 2011
अशआर.....कुछ यूँ भी....!!
अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं !
कुछ शेर फ़कत तुझको सुनाने के लिए हैं !!
मेरी ज़रूरतों पे रहा मुझसे *बदगुमान !
एहसास तेरे यूँ तो जमाने के लिए हैं !!
(*किसी के प्रति बुरी धारणा रखना)
औरों के लिए लफ़्ज़ों में बरतता है एहतियात !
दे दीं दुहाइयां ये सजा मेरे लिए है !!
दुश्मन को भी न दे ऐसी सजा मेरे हमसफ़र !
रिश्ते बहुत से यूँ तो निभाने के लिए हैं !!
गर इश्क है दिलों में खा लें सूखी रोटियां !
पकवान यूँ तो ढेरों जमाने भर के लिए हैं !!
कायल हूँ तेरी*फ़ित्न:अन्दाजी पे मेरे दोस्त !
वर्ना बहुत से दोस्त जमाने में पड़े हैं !!
(*इधर की उधर लगाने की आदत,भड़काना)
गर दो दिलों में इश्क हो तो बनता है रिश्ता !
वर्ना बहुत से जिस्म बाजारों में पड़े हैं !!
दौलत के बल पे कौन खरीद पाया है ख़ुशी !
गर मिल गए हों दिल ख़जाने खुले पड़े हैं !!
1 दिसंबर,2011
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