
१८ जन.१९८३
अभी तक
सुनती आयी थी कि
हवाएं गुनगुनाती हैं,
पर्वत बोलते है,
घाटियाँ खिलखिलाती हैं
पर मैं इन सब से अनजान थी
इनकी बोली,गुनगुनाहट,खिलखिलाहट
कुछ भी नहीं सुन पायी..
अपनी ही धुन में.
अपने आप में ही खोयी रही !
लेकिन अब...
तुमसे मिलने के बाद
अपने आप को जब भी
अकेली पाती हूँ मैं,
तब...
इन्हीं हवाओं,पर्वतों और घाटियों से
घिरा पाती हूँ अपने आप को
और न जाने कितनी देर तक
बातें करती रहती हूँ मैं
चुपचाप...........!!
खूबसूरत एहसास
जवाब देंहटाएंअभी तक
जवाब देंहटाएंसुनती आयी थी कि
हवाएं गुनगुनाती हैं,
पर्वत बोलते है,
घाटियाँ खिलखिलाती हैं
पर मैं इन सब से अनजान थी
इनकी बोली,गुनगुनाहट,खिलखिलाहट
कुछ भी नहीं सुन पायी..
अपनी ही धुन में.
अपने आप में ही खोयी रही !
लेकिन अब...
तुमसे मिलने के बाद
अपने आप को जब भी
अकेली पाती हूँ मैं,
बिलकुल जजा बिम्बों ,प्रतीकों और भावों से सजी मन को छू लेने वाली कविता पूनम जी बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं |
gahan anubhooti ko darshati umdaa kavita.
जवाब देंहटाएंanjaani bhoolon par bhee wah aday dand to deti hai..par boodhon ko bhee bacchon sa saday bhav se seti hai...prakriti kee gode me hamesh hee shanti milti hai...chir shanti bhee..tanhai me isse bada koi sathi nahi ..behtarin panktiyan...sadar badhayee aaur apne blog par amantran ke satha
जवाब देंहटाएंआपका पोस्ट अच्छा लगा । मेरे नए पोस्ट "खुशवंत सिंह" पर आपकी प्रतिक्रियायों की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद ।
जवाब देंहटाएंniyaamat khudaa kee aap par
जवाब देंहटाएंrakhtaa hai mast khud mein
इन्हीं हवाओं,पर्वतों और घाटियों से
जवाब देंहटाएंघिरा पाती हूँ अपने आप को
और न जाने कितनी देर तक
बातें करती रहती हूँ मैं
चुपचाप...........!!
bahut sunder...
ये तो हमसे भी पुरानी रचना है :-) (तारीख के मुताबिक)
जवाब देंहटाएंमुहब्बत में गिरफ्तार होने पर हर चीज़ बोलने लगती है |
बहुत बढ़िया ..
जवाब देंहटाएंबेहतरीन रचना अच्छी प्रस्तुती,....उम्दा पोस्ट
जवाब देंहटाएंमेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....
आफिस में क्लर्क का, व्यापार में संपर्क का.
जीवन में वर्क का, रेखाओं में कर्क का,
कवि में बिहारी का, कथा में तिवारी का,
सभा में दरवारी का,भोजन में तरकारी का.
महत्व है,...
पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे
वाह...!
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुंदर कविता।
mohak rachna. badhai.
जवाब देंहटाएंआपकी प्रस्तुति मन भावन व मन मोहक है ,पूनम जी.
जवाब देंहटाएंमनोभावों को बहुत सुन्दर पिरो देतीं हैं आप.
सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.
मेरी पोस्ट 'हनुमान लीला भाग-२' पर आपका स्वागत है.
लेकिन अब...
जवाब देंहटाएंतुमसे मिलने के बाद
अपने आप को जब भी
अकेली पाती हूँ मैं,
तब...
इन्हीं हवाओं,पर्वतों और घाटियों से
घिरा पाती हूँ अपने आप को
और न जाने कितनी देर तक
बातें करती रहती हूँ मैं
चुपचाप...........!!...
...
उस मोहक क्रांति कि यादें फिर से आ रही हैं पूनम जी ...शुभ है !
सुन्दर कविता..
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