२६-१२-२०११

मैंने खुशबू की तरह
तेरे होने के एहसास को
अपने इर्द-गिर्द
कुछ ऐसे फैला लिया है
कि चाहूँ भी तो
कोई दूसरी महक
आ ही नहीं पाती
मेरे पास...........
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तेरे होने का
एहसास ही बहुत है
मेरे लिए !
कम से कम
यह तो हुआ
कि मैं अकेली
नहीं रह गयी
खुद अपने ही लिए....
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लोग तो
साथ रहते हुए भी
न जाने कितनी दूरियां
बना लेते हैं...
मन ही मन !
और एक हम हैं
कि तुझे मन से ही
अपना मान बैठे हैं
दूर से ही....
दूर से ही....
bahut sunder ...
जवाब देंहटाएंमन ही तो है जिससे दूरियाँ भी नजदीकियां लगने लगती हैं.
जवाब देंहटाएंसुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.
बेहतरीन ...बहुत सुन्दर ...!
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर एहसास
जवाब देंहटाएंसुंदर रचना बेहतरीन प्रस्तुति !
जवाब देंहटाएंभावावेग की स्थिति में अभिव्यक्ति की स्वाभाविक परिणति दीखती है।
जवाब देंहटाएंवाह........प्रेम का ये सुखद पहलू जो एक गुदगुदी सी देता है .......शानदार |
जवाब देंहटाएंवाह.. खूबसूरत एहसास.
जवाब देंहटाएंसभी लाजवाब ... पर अंतिम वाला जानदार ... रिश्ते पास से होँ या दूर से ... दिल से होने चाहियें ...
जवाब देंहटाएंमैंने खुशबू की तरह
जवाब देंहटाएंतेरे होने के एहसास को
अपने इर्द-गिर्द
कुछ ऐसे फैला लिया है
कि चाहूँ भी तो
कोई दूसरी महक
आ ही नहीं पाती
मेरे पास...........
पूनम जी स्तुत्य है ये भाव ...प्रेम का ऐसा गहन भाव वाह ! सच में एक अद्वितीय रचना आपकी कलम से !
अद्भुत प्रेम का सजीव वर्णन .................
जवाब देंहटाएंतेरे होने का
जवाब देंहटाएंएहसास ही बहुत है
मेरे लिए !
कम से कम
यह तो हुआ
कि मैं अकेली
नहीं रह गयी
खुद अपने ही लिए...
बहुत खूब!
सादर