शुक्रवार, 27 मई 2011


आज की बारिश..........

आज की  बारिश
कुछ इस तरह हुई
कि...
मेरे मन को
कुछ नए से
एहसास दे गई......
और टेरेस पर बैठे-बैठे
बारिश में भीगते-भीगते
मैं कुछ इस तरह लिख गई.....








आज मैंने देखा
बादल का
एक छोटा सा टुकड़ा
तेजी से उड़ते हुए
और सोचा ये....
कि
इस पर बैठकर
तुम भी तो  सकते थे..... !

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बारिश की बूँदें
तन की अगन को
शांत कर गईं 
और 
मन को-
तुम.......!! 

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मैंने तुम्हें
आज फिर
महसूस किया.....
घने काले बादलों में,
कड़कती बिजली की चमक में,
बारिश की फुहार में,
तन पर गिरती
ठंडी बूंदों में,
और
चेहरे पर
गिरती जुल्फों को
हटाते हुए
जैसे तुम
कह रहे हो
कानों में मेरे...
कि-
तुम पास हो मेरे !
मेरे बहुत-बहुत पास !!

सोमवार, 23 मई 2011

 
 


मेरे  तुम......
 
मिट गई तेरे ह्रदय में
डूब कर सब पा लिया है !
खुद जो बढ़ कर हाथ तूने 
थाम कर अपना लिया है !!
न कभी सोचा था मैंने
तू है इतना पास मेरे !
जब,जहाँ चाहूं,तुझे पाऊँ
नयन बस मूँद मेरे !!
तू हमारा जब सहारा
फिर किनारा दूर है कब ?
बिन छुए स्पर्श कर लूं
जब,जहाँ चाहूँ वहां तब.......!!

गुरुवार, 19 मई 2011


भीगा मौन.....

बोलने वाले भी  
जाने क्या-क्या बोल जाते हैं
कहना होता है कुछ  
और कुछ और ही कह जाते है  
जहाँ ज़रुरत होती है खामोशी की
वहां शब्दों को यूँ ही 
व्यर्थ गँवाते हैं
और इस तरह वो...
भावनाओं का गीलापन तक  
महसूस नहीं कर पाते हैं
और फिर जिन्दगी भर 
अपने में नहीं...
बाहर ही कुछ खोजते रह जाते हैं,

मौन
में लिखे अक्षर भीगे ही होते हैं..!
ज़रुरत
है उनका गीलापन महसूस करने की !
जिसे
शायद बिरले ही समझ पाते हैं..!!
वर्ना
बोल-बोल कर 
शब्द
अपना महत्त्व खोते जाते हैं..!!

मंगलवार, 10 मई 2011

 








कृष्ण.....!!!(शरीर नहीं चेतना ) 



कृष्ण...!!!

हाँ,

तुमने खुद को  

हमेशा कृष्ण की जगह रखा

अपने इर्द-गिर्द  

गोपियों की कल्पना भी की

परन्तु मुझे......

रुक्मिणी की जगह  

न रख सके तुम !

वह अधिकार

जो कृष्ण ने रुक्मिणी को दिए

विवाह के बाद,

उसकी मर्यादा भी  

न रख सके तुम !

उस समय  

एक आम इंसान की तरह

तुम्हारे सारे भाव जागृत हो गए,

एक आम इंसान  की तरह  

"I AM ALWAYS RIGHT"

और तुम्हारा अहंकार  

हमारे बीच आ गए  !

फिर किस बात का  

झूठा दंभ भरते हो

बस ! यूँ ही खुद में कृष्ण को  

देखने की चेष्टा करते हो  !

कृष्ण तो एक चेतना  है....

एक शुद्ध समग्र चेतना  !!!

न स्त्री....!

न पुरुष.....!

शरीर से जुदा.... !

देह से अलग.... !

लेकिन तुम उनके शारीरिक क्रिया-कलापों का ही

उदाहरण देते रह गए ,

चेतना तक क्या कभी पहुँच पाए ?

मेरी भावनाओं को नकार कर

तुम बस  मेरे शरीर को ही टटोलते रह गए !

तुम्हारे इस उपापोह में

मैं कब अपने शरीर, अपने मन  से

अलग  हो  गई !

पता ही नहीं चला  !!

उस समय तो न पूछ पाई तुमसे

लेकिन आज पूछती हूँ....

कुछ खोज रहे थे तुम  ?

जो खोजा क्या वह पाया तुमने  ?

पता नहीं ?

बस इतना जानती हूँ  

कि तुम....

बस मेरे शरीर तक ही पहुंचे..

मेरी आत्मा तक तुम पहुँच ही नहीं  पाए....!!

गुरुवार, 28 अप्रैल 2011



अपनी ही श्रद्धांजलि........


हमने हमेशा तभी कुछ कहा..
जब कोई सुनने वाला हो सामने...!
हमने तभी कुछ किया
जब देखने वाला हो कोई सामने...!!
क्या कभी खुद से भी कुछ कहा ऐसा..
जो अभी तक नहीं कहा हो किसी से..?
क्या कभी कुछ ऐसा भी किया
जो किया हो केवल अपनी ख़ुशी से..?
हम करते हैं
कुछ भी तो
दिखाते हैं...
बताते हैं...
जिनके लिए करते है,
उनको बताते हैं
साथ में सारी दुनिया को बताते हैं !
राजा हरिश्चंद्र होने का
तमगा खुद अपने हाथों से लगते हैं !!
कभी-कभी
जीसस की तरह सूली भी
खुद को ही लगाते हैं...
एक तरह से खुद को
श्रद्धांजलि ही दे डालते हैं !
और फिर लोगों को
ये भी जताते हैं कि...
हम शहीद हो गए उनके लिए..!!




शनिवार, 16 अप्रैल 2011




तुम्हारे लिए......

वो तुम
जो मेरे साथ हो
मेरे पास हो,
हर समय
हर वक़्त,
मेरे भीतर
मेरे बाहर,
मेरे हर एहसास में..
मेरे प्यार में
मेरी खुशी में
मेरे गम में
मेरे आंसुओं में
मेरे हर ज़ज्बात में
क्या कहूं तुम्हें?
क्या नाम दूं तुम्हें ?
कौन हो तुम मेरे ?
कहना मुश्किल है ?
कोई और नहीं तुम...
मेरा हमसाया हो
बस.......!!

बुधवार, 13 अप्रैल 2011



नींदें.......

"नींदें"
आवारा ही होती हैं.....
जब चाहो तो नहीं आती
और....
बिन बुलाये ही
आ जाती हैं!
जिसको चाहो
उसे आने नहीं देती हैं
और अनजाने  को 
मेहमां बना बैठती हैं..!!
जहाँ चाहो
वहाँ नहीं जाने देतीं...
और...
अनजानी जगह
पहुंचा देती हैं..!!
सच में....
"नींदें आवारा" ही होती हैं....!!"